Friday, September 24, 2010


जाने क्या समझा वो मुझे,
जाने क्या समझी मैं उसे,
फासला नज़र आया...
कुछ क़दमों के साथ से !

48 comments:

मनोज कुमार said...

हम्म! चलो कुछ कदम का साथ तो रहा....

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
स्वरोदय विज्ञान – 10 आचार्य परशुराम राय, द्वारा “मनोज” पर, पढिए!

chitra said...

It is better tofind out early. Good one Babli..

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

साथ चल कर ही पता चलता है फासले का ...बढ़िया

राज भाटिय़ा said...

यही दो कदम जिन्दगी की यादो मै बस गये, बहुत सुंदर

M VERMA said...

फासले भी तो हौसले का ही परिणाम है
सुन्दर

ताऊ रामपुरिया said...

बिल्कुल सही कहा, शुभकामनाएं.

रामराम.

संतोष कुमार said...

बहुत बढियां
इसे पढ़ कर मुझे कुछ पुराना याद आ गया !

sheetal said...

sundar panktiya
jaane kya samjha ki jagah samjhe kardengi to jyaada accha lagega.
waise khubsurat rachna.
aise hi likhte rahiye.

AlbelaKhatri.com said...

फ़ासला जब नज़र आने लगता है मोहब्बत में

तो ख़ुश होना चाहिए

ये सोच कर

कि प्यार भले ही अँधा हो, आप अंधे नहीं हैं

हा हा हा हा


बढ़िया शायरी.......बधाई बबली जी !

वन्दना said...

फासला नज़र आया...
कुछ क़दमों के साथ से !

चंद शब्दों मे बडी गहरी बात कह दी।

विनोद कुमार पांडेय said...

कम शब्दों में बड़ी बात..एक भावपूर्ण रचना..बधाई

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

जाने क्या समझा वो मुझे,
जाने क्या समझी मैं उसे,
फासला नज़र आया...
कुछ क़दमों के साथ से !
बहुत खूब...बधाई.

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

gehri rachnaa...khoobsurat!

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

होता है! ऐसाभी होता है!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

यब बे दिलों का जहान है,
जरा फासले से मिला करो!
--
आपका शेर अच्छा है जी!

Arvind Mishra said...

जाने क्या वो समझा मुझे,
जाने क्या मैं समझी उसे,
फासले कुछ दरमियाँ हुए
बस यूं ही साथ चलते हुए

जरा इसे भी देखेंगीं ?

Arvind Mishra said...

पसंद आये तो दाद जरूर दीजियेगा :)
आपकी शायरी न जाने मुझे क्यूं कुछ लिख जाने को ललचा देती है ,
जब कि इस विधा में मेरे हाथ तंग हैं :)
वैसे क्रेडिट तो हमेशा मूल रचनाकार का ही है !

रचना दीक्षित said...

बहुत सुंदर,बडी गहरी बात कह दी।

खबरों की दुनियाँ , भाग्योत्कर्ष said...

बहुत खूब ।

डॉ टी एस दराल said...

समझ समझ की बात को सही समझा । अति सुन्दर ।

मो सम कौन ? said...

सही लिखा है आपने, वैसे भी अपनों का पता रास्ता चलने से और वास्ता पड़ने से ही चलता है।

SACCHAI said...

"जाने क्या, समझा वो मुझे,
जाने क्या, समझी मैं उसे,
फासला नज़र आया,
कुछ.. क़दमों के साथ से !"
sunder lines aapki "kalam" ko mera sukriya kahena jisne aise khubasurat alfaz kiye hai kaid"

badhai

---- eksacchai { AAWAZ }

http://eksacchai.blogspot.com

"खेल जगत के माफिया "- सुरेश कलमाड़ी tez news channal per bhi upalabdh

Udan Tashtari said...

बढ़िया!

ashish said...

beautiful thought.

हास्यफुहार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

अजय कुमार said...

जल्दी समझ में आये तो ठीक

janta ki aawaz said...

Wo Chalenge Umr Bhar Aap Ke Sath....

Mai Kafi Din Se Bahar Tha .....
Ek Bar Fir Shandar Rachna

ZEAL said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

Akanksha~आकांक्षा said...

छोटी पर प्रभावी रचना..बधाई.

Kunwar Kusumesh said...

ब्लॉग पढ़ा,आपकी रचना देखी.बढ़िया .

वैसे दूरियों में भी नजदीकियां होती हैं.
और नजदीकियों में भी दूरियां होती हैं .

कुँवर कुसुमेश
समय हो तो मेरा ब्लॉग देखें:kunwarkusumesh.blogspot.com

रवि धवन said...

फासला नज़र आया...
कुछ क़दमों के साथ से !
बढिय़ा।

Akshita (Pakhi) said...

कित्ता अच्छा लिखती हैं आप...बधाई.

महफूज़ अली said...

बहुत अच्छी लगी यह प्रस्तुति....

BK Chowla, said...

Very nice and really impressed

विरेन्द्र सिंह चौहान said...

भई ..वाह ..खूब लिखा है.
आभार

Sumandebray said...

good one and then you continue ... like two paralel lines in perfect harmony and peace

शिवम् मिश्रा said...

बेहद उम्दा ......बहुत खूब !

डॉ. मोनिका शर्मा said...

कुछ कदम चलकर ही समझ आता है..... हकीकत का आइना लगी रचना

José Ramón said...

Nice capture of this image

Greetings from
Creativity and imagination photos of José Ramón

boletobindas said...

हाहाहाहा चंद कदमों ही सबके बीच के फासले दिख जाएं तो फासलों को दूर करने की पहल जल्दी कर लें. नहीं तो अलविदा ही कह दें जल्दी। देरी में तो देर हो जाएगी न।

ZEAL said...

बहुत बढियां

संजय भास्कर said...

बढ़िया शायरी.......बधाई बबली जी !

रंजन said...

wonderful!!

vedvyathit said...

tumharie neh ki baris yh amrit ki boonden hain
inhi boondon se apni pyas sb chatk bujhate hain
sundr rchnayen hardik bdhai
dr.vedvyathit@gmail.com

psingh said...

bahut khub likha babli ji

अरुणेश मिश्र said...

लाजबाब ।

सहज साहित्य said...

इन चार पंक्तियों में आपने हृदय ही उड़ेलकर रख दिया । भावों को कम शब्दों में बाँधना कठिन होता है ।सफल अभिव्यक्ति के लिए बधाई

Umra Quaidi said...

लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

http://umraquaidi.blogspot.com/

उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
“उम्र कैदी”