Wednesday, April 1, 2009


काश ये ज़ालिम जुदाई होती,
रब्बा तूने ये चीज़ बनाई होती,
हम उनसे मिलते, प्यार उनसे होता,
तो ये ज़िन्दगी जो अपनी थी, वो परायी होती!

2 comments:

राव गुमानसिंघ said...

y to mere p thik baithta hai

Amit K Sagar said...

कुछ प्रख्यात शायरों को पढ़ो. जिन्होंने दीन-दुनिया-इश्क़ पर लिखा...हालांकि आपने पढ़ा ही होगा, तो मेरा फिर से कहना का अभिप्राय तो निश्चित ही आप समझ जाएँगीं.
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जारी रहें.
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हाँ, मैंने सन्देश किया था, क्या आपको मिला...बताना ज़रा...