Sunday, May 17, 2009


जाने ये कैसी दीवानगी है,
हर वक्त बस आप ही का ख्याल रहता है,
ये दिल सिर्फ़ आप ही को चाहता है,
के अब तो धड़कन की भी गवाही है,
आपके बिना तो सिर्फ़ तन्हाई है,
अब दिल में एक ही अरमान है,
तेरे दीदार के लिए ये ऑंखें बेचैन है !

19 comments:

ARUNA said...

वाह बबली वाह....बहुत ही प्यारी सी कविता है!

Abhishek Mishra said...

के अब तो धड़कन की भी गवाही है,
आपके बिना तो सिर्फ़ तन्हाई है,

Kya baat hai!

दिगम्बर नासवा said...

के अब तो धड़कन की भी गवाही है,
आपके बिना तो सिर्फ़ तन्हाई है,

प्रेम की...........उचतम पराकाष्ठा है.........
सचमुच............ऐसा ही होता है.सुन्दर अभिव्यक्ति

Syed Akbar said...

ये तो मोहब्बत की इन्तहा है....

sujata said...

Very sweet and nice poem Urmi!!

अमिताभ श्रीवास्तव said...

wah bahut shaandaar..
ese bhav aate he jab ham apne dil se kisiko chahte he..//deedaar ke liye bechen ho uthate he...

prem ki chah..aour prem ki chaahat..

tasvir bhi achhi he,tel chitra he kya...???

शोभना चौरे said...

vah ji bhut khoob.
tasveer bhut sundar.

SWAPN said...

joron par hai pyaar ka khumaar
bas tera hi intzar, intzar, intzar.

sunder pamktian, .......meri nahin ..........aapki..............

anilbigopur said...

Aahat si koi aaye to lagta hai ki tum ho,
Saya sa koi lehraye to lagta hai ki tum ho,
Ab tumhi batao tum kya kisi bhoot se kam ho?

Saiyed Faiz Hasnain said...

काफी अच्छा लगा ये जानकर की आप० को तन्हाई से भी प्यार है ............

अच्छी पोस्ट के लिए बधाई .................

अनिल कान्त : said...

mohabbat bhi kya cheez hai !!

venus kesari said...

आपसे गुजारिश है
आप गजल लिखा करिए (आपकी कविता के भाव मुझे बिलकुल गजल की तरह लगते है इस लिए कहाँ आगे आपको जैसा अच्छा लगे )

वीनस केसरी

RAJ SINH said...

दिल के हान्थों हो गये बेकार वो
खुद को खुद मे ही छुपा बेज़ार वो !
एक बुत आन्खों मे बस कर रह गया ,
कर रहे उस्का ही बस दीदार वो !

creativekona said...

बबली जी ,
बहुत संवेदनात्मक और बढ़िया अभिव्यक्ति...साथ ही सुन्दर चित्र भी ..
हेमंत कुमार

sawan said...

luks like u stole my feelings!!

मोहन वशिष्‍ठ said...

वाह बबली जी बेहतरीन रचना बहुत ही उम्‍दा विचार बेहतरीन बधाई देरी के लिए माफी

डा. श्याम गुप्त said...

अब तो अपना रूप दिखादो,
दर्पण से बाहर आजाओ।
अथवा प्यारी निदिया बनकर ,
आकर आन्खों में बस जाओ.।
मेरे मन में सरगम बनकर ,
प्रियतम तुम ही तो गाते हो।

manu said...

sunder,,,,tasweer,,,,,,,
achchhaa likhaa hi apne,,,,

परा वाणी - अरविंद पाण्डेय said...

रोचक और सुन्दर है