Wednesday, June 15, 2011


जाने ये कैसी है उलझन,
जाने ये कैसी है जुस्तजू,
जो कभी नहीं मिल सकता हमें,
क्यूँ है सिर्फ़ उन्हीं की आरज़ू !

40 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

मन की व्यथा पर लिखा गया सुन्दर अशआर!

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

बेहतरीन!

सादर

सदा said...

वाह .. बहुत ही अच्‍छी पंक्तियां ।

anu said...

ये आरजू ...ही तो बन जाती है दिल की लगी
जो सोने नहीं देती और किसी का होने भी नहीं देती

Dr. shyam gupta said...

सुन्दर ...अप्राप्य के पीछे भागना मानव की कमज़ोरी है और वही उसकी प्रगति दायक शक्ति....

दिगम्बर नासवा said...

ऐसा ही होता है .. जो नही मिलता कदर उसकी ही होती है ...

chirag said...

bahut khoob kaha aapane
jo aasani se mil jaye us cheez ka maja bhi to nahi hain

have"a"nice said...

nice dear

Have"a'nice said...

nice dear.visit on http://dil-e-naadan.blogspot.com/

kshama said...

Jo nahee mil sakte,aarzoo unheen kee rahtee hai!
Babli, are the paintings made by you?They are simply wonderful!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

जो मिल गया उसके लिए कौन सोचता है ? खूबसूरत पंक्तियाँ

Dr (Miss) Sharad Singh said...

जो कभी नहीं मिल सकता हमें,
क्यूँ है सिर्फ़ उन्हीं की आरज़ू !

भावनाओं का बहुत सुंदर चित्रण . ...

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

यही तो विडम्बना है!!

P.N. Subramanian said...

मनवा न माने!.

अनुपम अग्रवाल said...

कशिश है...
ये उलझन और ज़ुस्तज़ू तो सिर्फ साकी हैं

आरज़ू सिर्फ उन्हीं की,मिलन की प्यास बाकी हैं

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

आपकी इस उत्कृष्ट प्रवि्ष्टी की चर्चा कल शुक्रवार के चर्चा मंच पर भी है!

Patali-The-Village said...

भावनाओं का बहुत सुंदर चित्रण|

shama said...

Bahut hee sundar!

M VERMA said...

आरजू से शायद मिल भी जाये

आशु said...

कम शब्दों में मन की व्यथा ...बहुत सुन्दर

आशु

Kunwar Kusumesh said...

अच्छी पंक्तियाँ.

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

kya baat hai....khoobsurat sher

prerna argal said...

bahut hi sunder shabdon main likhi dil ke udgaaron ko ujaager karti hui pyaari si najm.badhaai aapko.

अनुपमा त्रिपाठी... said...

चाँद शब्दों में गहरे अल्फाज़ ...!!

रविकर said...

ब्लागर में सागर |
सोलह शब्दों के नागर ||

sheetal said...

ye mohabbat badi confusing cheez hain.
is situation par film Rangeela ka ye geet yaad aata hain.
'kya kare,kya na kare ye kaisi mushkil hai,koi to bataye iska hal
o mere bhai.....haha.:)
bahut sundar likha aapne.

Kailash C Sharma said...

बेहद मर्मस्पर्शी...

Deepak Saini said...

बहुत ही अच्‍छी पंक्तियां ।

डॉ टी एस दराल said...

बात तो सही है और सच भी ।

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति said...

सुन्दर ... सुन्दर अभिव्यक्ति

नूतन .. said...

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द ।

lokendra singh rajput said...

kya kahun////

upendra shukla said...

bahut acchi kavita hai
aapki aap log mere blog bhi aaye
my blog link- "samrat bundelkhand"

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" said...

मेरा बिना पानी पिए आज का उपवास है आप भी जाने क्यों मैंने यह व्रत किया है.

दिल्ली पुलिस का कोई खाकी वर्दी वाला मेरे मृतक शरीर को न छूने की कोशिश भी न करें. मैं नहीं मानता कि-तुम मेरे मृतक शरीर को छूने के भी लायक हो.आप भी उपरोक्त पत्र पढ़कर जाने की क्यों नहीं हैं पुलिस के अधिकारी मेरे मृतक शरीर को छूने के लायक?

मैं आपसे पत्र के माध्यम से वादा करता हूँ की अगर न्याय प्रक्रिया मेरा साथ देती है तब कम से कम 551लाख रूपये का राजस्व का सरकार को फायदा करवा सकता हूँ. मुझे किसी प्रकार का कोई ईनाम भी नहीं चाहिए.ऐसा ही एक पत्र दिल्ली के उच्च न्यायालय में लिखकर भेजा है. ज्यादा पढ़ने के लिए किल्क करके पढ़ें. मैं खाली हाथ आया और खाली हाथ लौट जाऊँगा.

मैंने अपनी पत्नी व उसके परिजनों के साथ ही दिल्ली पुलिस और न्याय व्यवस्था के अत्याचारों के विरोध में 20 मई 2011 से अन्न का त्याग किया हुआ है और 20 जून 2011 से केवल जल पीकर 28 जुलाई तक जैन धर्म की तपस्या करूँगा.जिसके कारण मोबाईल और लैंडलाइन फोन भी बंद रहेंगे. 23 जून से मौन व्रत भी शुरू होगा. आप दुआ करें कि-मेरी तपस्या पूरी हो

Manish Kr. Khedawat said...

khoobsurat rachna

_______________________________
मैं , मेरा बचपन और मेरी माँ || (^_^) ||

राजनेता - एक परिभाषा अंतस से (^_^)

mahendra verma said...

ज़िंदगी में ऐसा ही होता है,
गहरे भावों वाली सुंदर पंक्तियां।

सुमन'मीत' said...

kya karen ..aisa hi hota hai aksar ..usi ki tlash rahti hai ..jo nahi milta ....

रचना दीक्षित said...

कम शब्दों में मन की व्यथा. बहुत ही अच्‍छी पंक्तियां.

सहज साहित्य said...

न जाने ये कैसी है उलझन,
न जाने ये कैसी है जुस्तजू,
जो कभी नहीं मिल सकता हमें,
क्यूँ है सिर्फ़ उन्हीं की आरज़ू !
-ऐसा ही होता है जीवन में कि जो मिलना मुश्किल है , उसी को पाने के लिए मन में लालसा जग जाती है । इसी लालसा में जीवन का प्रवाह बना रहता है । सुन्दर प्रस्तुति !

Rakesh Kumar said...

जो कभी नहीं मिल सकता हमें,
क्यूँ है सिर्फ़ उन्हीं की आरज़ू !

आरजू या चाहत बहुत महत्वपूर्ण है .कहा गया है
'जा का जाहि पर सत्य सनेहू,ता उसे मिलहि न कुछ संदेहू'.सच्ची लगन,स्नेह या चाहत ही भक्ति है.मैं अगली पोस्ट इसी विषय पर लिखने की कोशिश करूँगा.